अपने घर के लिए नई ज़मीन खरीदने या अपनी मौजूदा ज़मीन पर घर बनाने में वास्तु शास्त्र का महत्व
नई ज़मीन खरीदते समय या किसी मौजूदा संपत्ति पर निर्माण करते समय, वास्तु शास्त्र घर के निवासियों के कल्याण, समृद्धि और खुशी को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकता है। यह भूखंड की दिशा, मिट्टी की गुणवत्ता और आसपास के वातावरण का आकलन करता है ताकि रहने की गुणवत्ता में वृद्धि हो और एक सामंजस्यपूर्ण अस्तित्व सुनिश्चित हो सके।
घर निर्माण में वास्तु शास्त्र के नियम (क्या करें और क्या न करें)
घर के वास्तु शास्त्र के नियम (क्या करें):
1. प्रवेश द्वार(एंट्रैंस): अधिकतम सकारात्मकता के लिए सुनिश्चित करें कि मुख्य प्रवेश द्वार उत्तर, पूर्व या उत्तर-पूर्व दिशा में हो।
2. बैठक कक्ष(लिविंग रूम): सामाजिक संबंधों को बढ़ावा देने के लिए इसे पूर्व या उत्तर-पूर्व में रखें।
3. रसोई: अपनी रसोई को दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थापित करें; उत्तर-पश्चिमी कोना दूसरा सबसे अच्छा विकल्प है।
4. शयनकक्ष(बेडरूम): मास्टर बेडरूम के लिए दक्षिण-पश्चिमी कोना आदर्श है, जो स्थिरता और स्वास्थ्य को बढ़ावा देता है।
घर के वास्तु शास्त्र के नियम (क्या न करें)
1. अव्यवस्था(क्लटर): अव्यवस्था और बाधाओं से बचें, विशेष रूप से घर के केंद्र में, ताकि वास्तु ऊर्जा का निर्बाध प्रवाह हो सके।
2. शौचालय: शौचालयों को कभी भी उत्तर-पूर्व या केंद्र में न रखें; यह शुभ ऊर्जा को दूषित कर सकता है।
3. पेड़: बड़े पेड़ इमारत के उत्तर या पूर्व की ओर बहुत पास नहीं होने चाहिए।
4. जल तत्व(वॉटर फीचर्स): दक्षिण या पश्चिम में जल तत्वों से बचें, क्योंकि वे नकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित कर सकते हैं।
घर निर्माण में वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों को शामिल करने से जीवन की गुणवत्ता पर बहुत प्रभाव पड़ सकता है। अपने घर को वास्तु के प्राकृतिक ऊर्जा प्रवाह के साथ संरेखित करके, आप एक शांतिपूर्ण और समृद्ध रहने वाले वातावरण का मार्ग प्रशस्त करते हैं।